गिग वर्कर्स के पक्ष में खड़ा न होना शर्मनाक था

गिग मजदूर एक स्वीकृत शब्द बन चुका है जो डिजिटल प्लेटफार्म पर/से काम करने वाले मजदूरों के लिए प्रयोग किया जाता है। पिछले 20 सालों में यह सबसे तेजी उभरता हुआ कार्य का वह हिस्सा है जिसमें मजदूरों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। भारत में यह सबसे अधिक रोजगार के विकल्प की तरह खड़ा हो रहा है।

गिग मजदूरों का मुद्दा अभी हाल ही में एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया जब कांग्रेस से सांसद शशि थरूर ने भारत सरकार द्वारा विश्व श्रमिक संगठन, आईएलओ के 114वें सम्मेलन में 12 जून, 2026 को गिग मजदूरों के पक्ष में पारित किये गये प्रस्ताव पर भारत सरकार के मतदान से दूर रहने के फ़ैसले पर सवाल उठाया। जबकि वहां मौजूद मजदूरों और मालिकों के प्रतिनिधियों ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। शशि थरूर ने भारत सरकार के रवैये को ‘राष्ट्रीय शर्म’ कहा।

यह प्रस्ताव कार्यस्थल की सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण के मानकों को सुनिश्चित करता है। इस प्रस्ताव के पक्ष में 406 प्रतिनिधियों ने वोट दिया, खिलाफ में सिर्फ 8 वोट पड़े जबकि 36 सदस्यों ने वोट नहीं दिया, जिसमें भारत भी शामिल था।

भारत में अंग्रेजी हुकूमत के दौरान ही श्रम संबंधी विवाद और प्रावधानों के निपटारे को लेकर कई सारी रिपोर्टों में मजदूर, मालिक और सरकार के त्रिपक्षीय तरीके से हल करने का प्रस्ताव दिया गया था। डा. आंबेडकर ने श्रम मंत्रालय का कार्यभार संभालने के बाद इसी पक्ष पर जोर दिया और इसे सूत्रबद्ध किया। 1947 के बाद भी इसी परम्परा को आगे ले जाने पर सहमति बनी लेकिन 1960 के दशक में भारत सरकार ने खुद को एक पक्षकार की भूमिका से अलग कर लिया और कुछ ही मसलों में अपनी उपस्थिति को स्वीकार किया।

खासकर, न्यूनतम मजदूरी निर्धारण के मसले पर वह अपनी सीमित भूमिका को बनाये रखा। इसका सीधा फायदा मालिक समूहों को हुआ जिन्होंने अपनी ताकत से नीतियों को ही नहीं मजदूरों के संबंध में बनाये जाने वाले प्रावधानों को भी नियंत्रित कर लिया। लेकिन, मजदूरों के अंसतोष का सीधा मुकाबला मालिकों से ही होता है, ऐसे में वे मजदूरों के आंदोलन को रोकने के लिए सरकार से हस्तक्षेप की मांग करते रहते हैं। गिग मजदूर का मसला भी इसी तरह का है।

यह डिजिटल प्लेटफार्म पर चलने वाला कारोबार है जिसमें मालिक की सीधी उपस्थिति नहीं होती। मजदूर को उपभोक्ता के साथ सीधे संबंधो में रहना होता है। मालिक मजदूरों के साथ एकतरफा रिश्ते में होता है और सारा कारोबार अलगोरिदम के माध्यम से चलता है। भुगतान भी इसी के अनुसार होता है। यह कारोबार डिजिटल प्लेटफार्म पर जितना संगठित होता है, कार्यवाही में उतना ही बिखरा हुआ होता है। इस कारोबार से संबंधित सारी असुरक्षाएं मजदूरों के कंधे पर होती हैं।

इससे मजदूरों पर कार्य और उसे पूरा करने, भुगतान पाने आदि को लेकर भयावह दबाव होता है।

नीति आयोग द्वारा जारी रिपोर्ट ‘इंडियाज बूमिंग गिग एण्ड प्लेटफार्म इकाॅनोमी, 2022’ भी गिग मजदूरों की बढ़ती संख्या और उसके हितों को ध्यान में रखते हुए उन पर व्यापक दृष्टिकोण से अध्ययन करने और उचित कदम उठाने की बात करती है। नीति आयोग इसे अनौपचारिक क्षेत्र में रखने के लिए नहीं कहता है, वह इस पर उचित कदम उठाने की बात करता है। दिसम्बर, 2025 में ही जाकर गिग मजदूरों को औपचारिक मान्यता मिली और उन्हें श्रम कानून के दायरे में लाया गया।

उनकी सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेवारी सरकार ने उठाने का फैसला लिया और उन्हें ई-श्रम पोर्टल से जोड़ने का कार्यभार तय हुआ। लेकिन, उन्हें अनौपचारिक या असंगठित क्षेत्र का मजदूर ही माना गया। उस समय इसी बात को प्रचारित किया गया कि सरकार गिग वर्कर को मान्यता दे रही है और उन्हें सामाजिक सुरक्षा दी जाएगी और इस संदर्भ में उन्हें अन्य प्रावधानों से भी जोड़ा जाएगा। यहां समस्या राज्य द्वारा श्रम की श्रेणियों को लेकर बनाये जाने वाले प्रावधानों को लेकर भी है।

जैसे ही ये गिग मजदूर अंसगठित और अनौपचारिक क्षेत्र में गिन लिए जाते हैं, न्यूनतम मजदूरी के कई प्रावधानों से बाहर हो जाते हैं, साथ ही उनके संगठित होने के अधिकार भी कम हो जाते हैं। आमतौर पर अंसगठित और अनौपचारिक मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी का मानक सरकार अपने नोटिफिकेशन से तय करती है, जो सामान्यतः एकतरफा ही होते हैं। इसी तरह सामाजिक सुरक्षा के मानक भी ऊपर से ही तय होते हैं और भुगतान तय मानकों से होते हैं, जरूरतों और कार्यस्थलों से तय नहीं होते।

अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के संबंध में ज्यादातर प्रावधान राज्य सरकारों से आते हैं, जबकि केंद्र सरकार की भूमिका बेहद सीमित होती है। यदि हम गिग वर्कर के प्लेटफार्म के देखें, तब ये काफी विशाल कारपोरेट समूह होते हैं जिस पर लाखों मजदूर काम कर रहे होते हैं और उनके कार्य और भुगतान पर नियंत्रण बेहद केंद्रीयकृत होते हैं। ऐसे में, कार्यस्थलों और काम की विशेषता के आधार पर ही मजदूरों के संदर्भ में कानूनी प्रावधान होने चाहिए। जो फिलहाल नहीं दिख रहा है।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन में इस दिशा में उठाये गये कुछ कदम से भी भारत सरकार द्वारा हाथ खींच लिया जाना उसके श्रम के प्रति विरोधी रवैये को ही दिखाता है जो कोविड आपदा के दौरान खुलकर सामने आया और अब भी जारी है।

इस जुलाई तक ई-श्रम पोर्टल पर अंगठित मजदूरों की पंजीकरण संख्या 31.78 करोड़ हो चुकी थी। यह तब है जब भारत का विशाल असंगठित मजदूर पंजीकरण करा पाने की स्थिति में नहीं है। असंगठित मजदूरों की अनुमानित संख्या इस समय 50 करोड़ के आसपास मानी जाती है। गिग मजदूर को इसी मजदूर श्रेणी में रखा जाता है। आर्थिक सर्वेक्षण, 2025-26 के अनुसार 2025 में भारत में गिग मजदूरों की संख्या 1 करोड़ 20 लाख थी।

खेती और उद्योगों की स्थिति को देखते हुए यह अनुमान लगाया जा रहा है कि 2029-30 तक गिग मजदूर भारत के कुल मजदूरों का 6.7 प्रतिश हिस्सा बन सकता है। ई-श्रम पोर्टल को विविध 15 योजनाओं को जो विभिन्न केंद्रीय मंत्रालय और विभागों से जुड़े हुए हैं, से जोड़ दिया गया है, जो मुख्यतः सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं हैं। इन सामाजिक सुरक्षाओं मुख्यतः वे हिस्से हैं जो दुर्घटना और भावी जीवन से जुड़े हुए हैं। ये धन के मामलों में इतने कम हैं जिसके आधार पर किसी सामाजिक सुरक्षा की कल्पना ही अर्थहीन दिखती है।

मुख्य बात है कि काम के दौरान मजदूर को क्या भुगतान दिया जा रहा है, किन सुरक्षा की व्यवस्था है और भावी सुविधाओं के क्या प्रावधान है? मजदूर को ये अनिश्चिताएं सबसे अधिक प्रभावित करती हैं। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन अपने प्रस्ताव प्लेटफार्म या अन्य डिजिटल फार्म पर काम करने वाले लोगों को, उन्हें चाहे जो भी नाम दिया जाए, श्रमिक मानने पर जोर देती है और उन्हें होने वाले उचित भुगतानों को सुनिश्चित करने के लिए कहती है।

समय पर भुगतान, कार्यस्थल की सुरक्षा, कार्यपद्धति में पारदर्शिता, कार्य से बाहर कर दिये जाने के मामले में मालिकों के मनमानेपन पर रोक और शिकायत आने पर उसे हल करने के लिए उचित व्यवस्था आदि के लिए इस सम्मेलन ने जोर दिया और इस संदर्भ में कानूनी प्रावधान सुनिश्चित करने के लिए कहा। इस संदर्भ में, निश्चित ही अधिक प्रभावी और निर्णयकारी प्रभाव तो खुद गिग मजदूर ही डाल सकते हैं। उन्हें ही इस दिशा में पहलकदमी करनी होगी।

(अंजनी कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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